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एक लड़की का डर

Posted On: 2 Aug, 2013 Others,कविता में

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माँ मुझे लगता है डर
डर लगता है मुझको बाहर जाने से
सूरज की रोशिनी से
चाँद के निकल जाने से
आँगन से रखते बाहर कदम
ना जाने कितनी क्रूर नजरे
उठ जाती है मेरी तरफ
डरी डरी सहमी सहमी सी
आगे बढती जाती हूँ
घबराई सी अपनी मंजिल पर
आखिर पहुच जाती हूँ
स्कूल,कॉलेज,ऑफिस या हो बाज़ार
दिल मेरा अनजाने से शक से
डर जाये हर बार
लगता है मुझको हर पल ऐसे
कोई शख्स पीछे पड़ा हो मेरे जैसे
हर वक़्त हर लम्हा
उठते बैठते ,सोते जागते
छाया रहता जेहन में यह ख्याल
कही दामिनी जैसा ना मेरा भी हाल
इसकी कल्पनामात्र ही
मुझे झकझोर जाती है
बाहर निकलने की मेरी हिम्मत
अक्सर तोड़ जाती है
माँ मुझे डर लगता है
डर लगता है मुझे बाहर जाने से
मुझे नही जाना कभी कहीं
मुझे अपने पल्लू में ही छुपाले कहीं
इस माँ बोली
बेटी ना तू घबरा
अबला नही सबल बन कर तू दिखा
उठती है जो बुरी नजर तुम पर
बन कर सूरज की किरण
उनको तुझे झुकाना है
उठता है जो हाथ तेरी और
बन चंडी उस असुर का
नामोनिशां मिटाना है
किसी और पर नही निर्भर तू
ना ही है निर्बल तू
अपनी शक्ति खुद
तुझको
बन कर आज दिखाना है

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ADVOCATE VISHAL PANDIT के द्वारा
March 21, 2014

बहुत ही ख़ूबसूरत प्रस्तुति.

    Ritu Gupta के द्वारा
    March 23, 2014

    pritikiriya dene ke liye shukriya vishal ji

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
August 3, 2013

कही दामिनी जैसा ना मेरा भी हाल इसकी कल्पनामात्र ही मुझे झकझोर जाती है बाहर निकलने की मेरी हिम्मत अक्सर तोड़ जाती है माँ मुझे डर लगता है सच को बयाँ करती सुन्दर कविता …समाज में बहुत ही ऐसे निकृष्ट लोग अपराधी तत्व हैं जिनसे भय व्याप्त है लेकिन जरुरत है मन मजबूत कर साहस बटोर आवाज उठाते बढ़ते जाने की ….प्रभु साहसी को ताकत देगा ही भ्रमर ५


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